तब तेरि याद सि आ जति है
और एक आ एक ये आखे मेरि नम सि हो जति है.
मा तु मेरि सब से बढि प्रेर्ना थि
और आधार थि मेरि हर धार्णा कि
तुझसे हि तो जाना कि किसका ओर कैसे करे आदर
तु मेरे लिये ग्यान का थि एक गहरा सागर,
तुने हि तो सहि राह पे चलना सिखाया.
हर मुश्किल को मेरि मुझसे हि असान करवाय.
आग्यात नहि हु मै तेरि कठिनाइओ से जो तुने सहि है मेरे लिये
रुदान केवल इतना है कि सारे सुख नहि बटोर पाया मै तेरे लिये.
जीवन मे जो तेरि कमि है
ळग्ता है जैसे सब कुछ बन्जर भुमि है
तेरि पर्छाई जैसे किसि पेड कि ठन्दि सि छाया
जिसकि शरण मे मै परिपक्व भि हो पाया
कितना था ,है और रहेग मुझे तुझसे लगाव,
ऊत्तर मिला जब तेरि मोक्श पश्चात हुआ हमरा अलगाव.
I have tried to portray feeling of a son who lost his mother to Death.
-D.V.
[Original Post: Vikram Doraj's Blog]

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